पी शौक से वाइज अरे क्या बात है डर की दोजख तिरे कब्जे में है जन्नत तेरे घर की - शकील |
मैं मैकदे की राह से होकर गुजर गया वरना सफर हयात का काफी तबील था - अब्दुल हमीद ''अदम'' |
कुछ सागरों में जहर है कुछ में शराब है ये मसअला है तश्नगी किससे बुझाई जाय - शहरयार ''अखलाक'' |
दुख्तरे-रज ने उठा रक्खी है आफत सर पर खैरियत गुजरी कि अंगूर के बेटा न हुआ - अकबर इलाहाबादी |
रिन्दे-खराब-हाल को जाहिद न छेड़ तू तुझको पराई क्या पड़ी अपनी निबेड़ तू - जौक |
उस शख्स पर शराब का पीना हराम है जो रहके मैकदे में भी इन्सां न हो सका - पारसा कौसरी |
इतनी पी है कि बाद तौबा भी बे पिए, बेखुदी सी रहती है - रियाज खैराबादी |
एक हमें आवारा कहना कोई बड़ा इल्जाम नहीं दुनियावाले, दिलवालों को और बहुत कुछ कहते हैं - हबीब जालब |
सहरा में मेरे हाल पे कोई भी न रोया बस फूट के रोया तो मेरे पांव का छाला - नजीर अकबराबादी |
इस जिंदगी में और मुसीबत कोई नहीं खुद जिंदगी हुई है मुसीबत कभी-कभी - आनंद नारायण मुल्ला |
कभी खुशी से खुशी की तरफ नहीं देखा तुम्हारे बाद किसी की तरफ नहीं देखा - मुनव्वर राना |
यूं इस कदर हवा नहीं चलती उसे तो सिर्फ हमारा दिया बुझाना था - प्रफुल्ल चंद्र पाठक
उठे कभी घबरा के तो मैखाने में हो आए पी आए तो फिर बैठ रहे याद-ए-खुदा में - रियाज |
आए कुछ अब, कुछ शराब आए इसके बाद आए जो अजाब आए - फैज अहमद ''फैज'' |
वीरां है मैकदा खुम-ओ-सागर उदास है तुम क्या गए कि रूठ गए दिन बहार के - फैज अहमद ''फैज'' |
आए थे हंसते खेलते मैखाने में ''फिराक'' जब पी चुके शराब तो संजीदा हो गए - फिराक गोरखपुरी |
साकी गई बहार, रही दिल में ये हवस तू मिन्नतों से जाम दे और मैं कहूं कि बस - सौदा |
जाहिद, शराब पीने से काफिर हुआ हूं मैं क्या डेढ़ चुल्लू पानी में ईमान बह गया ? - जौक |
कर्ज की पीते थे मय, और कहते थे कि हां रंग लाएगी हमारी फाकामस्ती एक दिन - गालिब |
अब तो जाते हैं मैकदे से ''मीर'' फिर मिलेंगे गर खुदा लाया - मीर |
कहां मैखाने का दरवाजा ''गालिब'' और कहां वाइज पर इतना जानते हैं कल वो जाता था कि हम निकले - गालिब |
मैखाना-ए-हस्ती में अक्सर, हम अपना ठिकाना भूल गए या होश से जाना भूल गए, या होश में आना भूल गए - अदम |
नशा पिला के गिराना तो सब को आता है मजा तो जब कि गिरतों को थाम ले साकी - अब्दुल हमीद ''अदम'' |
जाम जब पीता हूं मुंह से कहता हूं बिस्मिल्लाह कौन कहता है कि रिन्दों को खुदा याद नहीं - इकबाल सफीपुरी |
साकिया तिश्नगी की ताब नहीं जहर दे दे अगर शराब नहीं - अज्ञात |
देखना-देखना ये हजरते-वाइज ही न हों रास्ता पूछ रहा है कोई मैखाने का - शकील |
छलक के कम न हो ऐसी कोई शराब नहीं निगाहे-नर्गिसे-राना तेरा जवाब नहीं - फिराक |
जकड़ी हुई हैं इनमें मिरी सारी कायनात गो देखने में नर्म हैं तेरी कलाइयां - नदीम कासिमी |
तुम्हारे नाज किसी और से तो क्या उठते खता मुआफ ये पापड़ हमीं ने बेले हैं - अन्जुम फौकी |
मेरे महबूब के दामन की वो एक जुम्बिश है बागवां जिसको गुलिस्तां की हवा कहते हैं -फलक देहलवी |
खुदा जाने करेगा चाक किस-किस के गरीबां को अदा से उनका चलने में वो दामन का उठा लेना -जुरअत |
हिज्र हो या विसाल ऐ अकबर जागना रातभर कयामत है - अकबर इलाहाबादी |
तुम नहीं पास कोई पास नहीं अब मुझे जिन्दगी की आस नहीं - जिगर बरेलवी |
आ के तुझ बिन इस तरह ऐ दोस्त घबराता हूं मैं जैसे हर शै में किसी शै की कमी पाता हूं मैं - जिगर मुरादाबादी |
कह्र हो या बला हो जो कुछ हो काश कि तुम मेरे लिये होते - गालिब |
ऐ इश्क की बेबाकी क्या तूने कहा उनसे जिस पर उन्हें गुस्सा है इंकार भी हैरत भी - हसरत |
अंगड़ाई भी वो लेने न पाए उठा के हाथ देखा जो मुझको छोड़ दिए मुस्कुरा के हाथ - वफा रामपुरी |
गरज कि काट दिए जिन्दगी के दिन ऐ दोस्त वो तेरी याद में हो या तुझे भुलाने में - फिराक गोरखपुरी |
फिर दिल पे है निगाह किसी की रुकी रुकी कुछ जैसे कोई याद दिलाता है आज फिर - फिराक गोरखपुरी |
थोड़ी बहुत मुहब्बत से काम नहीं चलता ऐ दोस्त ये वो मामला है जिसमें या सब कुछ या कुछ भी नहीं - फिराक |
हम भी कुछ खुश नहीं वफा करके तुमने अच्छा किया निबाह न की - मोमिन |
समझते क्या थे मगर सुनते थे फसानाए-दर्द समझ में आने लगा जब तो फिर सुना न गया -यग़ाना |
पूछा जो उनसे गैर को चाहूं तो क्या करो बोले कि जाओ चाहो कोई दूसरा भी है - हकीम काशिफ |
मेरी आंखें और दीदार आप का या कयामत आ गई या ख्वाब है - आसी गाजीपुरी |
बुत को बुत और खुदा को जो खुदा कहते हैं हम भी देखें कि तुझे देख के क्या कहते हैं - दाग |
अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जाएंगे मर के भी चैन न पाया तो किधर जाएंगे - जौक |
सितारों के आगे जहां और भी हैं अभी इश्क के इम्तेहां और भी हैं - इकबाल |
मासूम है मुहब्बत लेकिन उसी के हाथों ये भी हुआ कि मैंने तेरा बुरा भी चाहा - फिराक गोरखपुरी |
रोग पैदा कर ले कोई जिंदगी के वास्ते सिर्फ सेहत के सहारे जिंदगी कटती नहीं - फिराक गोरखपुरी |
इश्क कहता है दो आलम से जुदा हो जाओ हुस्न कहता है जिधर जाओ नया आलम है - आसी गाजीपुरी |
देखा न आंख उठा के कभी अहले-दर्द ने दुनिया गुजर गई गमे-दुनिया लिये हुये -फानी बदायूंनी |
इश्क कहते हैं जिसे सब वो यही है शायद खुद-ब-खुद दिल में है इक शख्स समाया जाता - हाली |
ऐ इश्क तूने अक्सर कौमों को खा के छोड़ा जिस घर से सर उठाया उसको बिठा के छोड़ा - हाली |
इश्क में कहते हो हैरान हुये जाते हैं ये नहीं कहते कि इन्सान हुए जाते हैं - जोश मलीहाबादी |
इश्क ने ''ग़ालिब'' निकम्मा कर दिया वरना हम भी आदमी थे काम के । - ग़ालिब |
इश्क में कहते हो हैरान हुये जाते हैं ये नहीं कहते कि इन्सान हुए जाते हैं - जोश मलीहाबादी |
इश्क ने ''ग़ालिब'' निकम्मा कर दिया वरना हम भी आदमी थे काम के । - ग़ालिब |
|